ये दिल, ये पागल दिल मेरा

Lyricist: Mohsin Naqvi
Singer: Ghulam Ali

अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो
और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।

ये दिल, ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया, आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ, आवारगी।

कल शब मुझे बेशक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उसने कहा आवारगी।

इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी।

ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीराँ सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी।

कल रात तनहा चाँद को देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी।

दश्त = Desert
शब = Night
सबब = Reason

13 Replies to “ये दिल, ये पागल दिल मेरा”

  1. You haven’t included my favourite sher:
    Ek tu ki sadiyon se mere humraah bhi, humraaz bhi,
    Ek main ji tere naam se na-aashna, aawargi.
    By the way this ghazal can be interpreted in many ways. I like the embiguity of the ghazal.

  2. ये दिल, ये पागल दिल मेरा, क्यों बुझ गया, आवारगी
    इस दश्त में इक शहर था, वो क्या हुआ, आवारगी

    कल शब मुझे बे-शक्ल सी, आवाज़ ने चौँका दिया
    मैंने कहा तू कौन है, उसने कहा, आवारगी

    इक तू कि सदियों से, मेरे हम-राह भी हम-राज़ भी
    इक मैं कि तेरे नाम से न-आश्ना, आवारगी

    ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीरां सफ़र
    हम लोग तो उक्ता गये अपनी सुना, आवारगी

    इक अजनबी झोंके ने पूछा, मेरे ग़म का सबब
    सहरा की भीगी रेत मैंने लिखा, आवारगी

    ले अब तो दश्त-ए-शब की, सारी वुस’अतें सोने लगीं
    अब जागना होगा हमें कब तक बता, आवारगी

    कल रात तनहा चाँद को, देखा था मैंने ख़्वाब में
    ‘मोह्सिन’ मुझे रास आयेगी शायद सदा, आवारगी

    शायर:-मोहसिन नक्वी

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