सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

Lyricist: Athar Nafeez
Singer: Ghulam Ali

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं।
अपने गुमगश्ता किनारों के लिए बहता हूँ मैं।

जल गया सारा बदन इन मौसमों की आग में
एक मौसम रूह का है जिसपे अब ज़िंदा हूँ मैं।

मेरे होंठों का तबस्सुम दे गया धोखा तुझे
तूने मुझको बाग़ जाना देख ले सहरा हूँ मैं।

देखिए मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन
लम्हा भर को वक़्त की दहलीज़ पे आया हूँ मैं।


गुमगश्ता = Errant, Lost, Missing, Wandering
तबस्सुम = Smile, Smiling
सहरा = Desert, Wilderness
पज़ीराई = Reception

8 Replies to “सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं”

  1. This “ka” is because of “dariya” and not because of “saansen”.

    If it were “nadee”, it would have been “saanson kee nadee”.

  2. Hi there,

    Is there a way that i can contribute to this list i am glad that there are so many in your collection and i would love to add a few to this collection i mean obviously if u like them

    Please do let me know

    thanks and regards,
    Rehan

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