करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे

Lyricist: Ahmed Faraz
Singer: Ghulam Ali

करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे,
गज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे।

वो ख़ार-ख़ार है शाख-ए-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे।

ये लोग तज़किरे करते हैं अपने प्यारों के
मैं किससे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे।

जो हमसफ़र सरे मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे।

तज़किरे (तज़किरा) = Mention, Talk about

3 Replies to “करूँ ना याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे”

  1. This ghazal just kills me! For the girl whom I loved more than anything in my life has left me and I too am finding it impossible to forget her.
    The best sher is:
    Ye log tazkire karte hain apne yaron ki,
    Main kis se baat karoon, aur kahan se laun usse.
    I feel like crying. I guess it’s okay for a man to cry on a ghazal.

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