ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

Lyrics: Mirza Ghalib
Singer: Chitra Singh

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना
कि खुशी से मर न जाते ग़र ऐतबार होता।

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज होता कोई ग़म-गुसार होता

कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।

विसाल = Union
नासेह = Councellor
चारासाज = Healer
ग़म-गुसार = Sympathizer

8 Replies to “ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता”

  1. ग़र -> अगर
    —————–
    यह वाला शे’र शायद फिल्म “मिर्ज़ा ग़ालिब” में है

    हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों न ग़र्क-ए-दरिया
    न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता।

    और मक़ता यह रहा, जो मुझे काफी पसन्द है

    ये मसाइले-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’
    तुझे हम वली समझते जो न बाद’अ-ख़्वार होता।

  2. Waah waah…”Hamein kya buraa thha marnaa, gar ek baar hotaa”….

    Yun to har lamhaa terii yaad kaa bojhal guzraa
    Dil ko mehsoos huyii terii kamii shaam ke baad…

    [ bojhal = heavy/sad ]

  3. There is some problem wordpress is creating when the titles are given in Hindi. I have changed the URLs to English for the time being. It should be accessible now.

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