कल चौदहवीं की रात थी

Lyrics: Ibn-e-Insha
Singer: Abida Parveen

कल चौदहवीं की रात थी,
शब भर रहा चर्चा तेरा।
कुछ ने कहा ये चाँद है,
कुछ ने कहा चेहरा तेरा।

हम भी वहीं मौज़ूद थे,
हमसे भी सब पूछा किए।
हम हँस दिए हम चुप रहे
मंज़ूर था पर्दा तेरा।

इस शहर में किससे मिलें
हमसे तो छूटी महफ़िलें।
हर शख़्स तेरा नाम ले
हर शख़्स दीवाना तेरा।

कूचे को तेरे छोड़ कर
जोगी ही बन जाएँ मग़र,
जंगल तेरे, पर्वत तेरे
बस्ती तेरी, सहरा तेरा।

बेदर्द सुननी हो तो चल
कहता है क्या अच्छी गज़ल
आशिक तेरा, रुसवा तेरा
शायर तेरा ‘इंशा’ तेरा।

ये बातें झूठी बातें हैं

Lyricist: Ibn-E-Insha
Singer: Ghulam Ali

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं।
तुम इन्शा जी का नाम न लो, क्या इन्शा जी सौदाई हैं?

हैं लाखों रोग ज़माने में क्यों इश्क है रुसवा बेचारा
हैं और भी वज़हें वहशत की इन्शा को रखतीं दुखियारा।
हाँ, बेकल-बेकल रहता है, हो पीत में जिसमें जी हारा
पर शाम से लेकर सुबहो तलक यूँ कौन फिरे है आवारा।

गर इश्क किया है तब क्या है, क्यों शाद नहीं आबाद नहीं
जो जान लिए बिन टल ना सके ये ऐसी भी उफ़ताद नहीं।
ये बात तो तुम भी मानोगे वो कैस नहीं फ़रहाद नहीं
क्या हिज्र का दारू मुश्किल है, क्या वस्ल के नुस्खे याद नहीं।

जो हमसे कहो हम करते हैं, क्या इन्शा को समझाना है।
उस लड़की से भी कह लेंगे गो अब कुछ और ज़माना है।
या छोड़ें या तक़मील करें ये इश्क है या अफ़साना है।
ये कैसा गोरखधंधा है, ये कैसा तानाबाना है।


रुसवा = Disgraced
वहशत = Solitude, Grief, Fear
पीत = Love, Affection
शाद = Cheerful, Happy
उफ़ताद = Calamity
हिज्र = Separation
दारू = Medicine, Remedy
वस्ल = Communion
गो = Although, Though
तक़मील = Getting over with, Taking to a conclusion